Wednesday, September 9, 2026

अपनी बात

हिंदी दिवस के समोसे और गुलाब जामुन…

इस संपादकीय की शुरुआत में ही ‘पुरवाई’ पत्रिका यह घोषणा करती है कि हिंदी भाषा को लेकर भारत सरकार के पास न तो कोई...

ग़ज़ल एवं गीत

बलजीत सिंह की गज़लें

  ग़ज़ल 1 लग रहा था कि घर में तन्हा हूँ मैं तो लेकिन नगर में तन्हा हूँ साथ मेरे है क़ाफिला फिर भी है तअज्जुब सफ़र में तन्हा...

हरकीरत हीर की तीन ग़ज़लें

1. सफ़र में छोड़कर हमको न यूँ तो हमसफ़र जाएँ, अधूरी ज़िंदगी कैसे कटेगी, हम किधर जाएँ। न यूँ भी रूठ के मुँह मोड़ के हमसे उधर...

साक्षात्कार

कविता

सूर्यकांत शर्मा की कविता-हिंदी हूँ मैं..

हिंद की हिंदी हूँ मैं, पर क्या निज़ाम की बिंदी हूँ, मैं। जन-जन की चेतना हूँ, संज्ञा हूँ!सर्वनाम हूँ? और तो और मानवी क्रिया शक्ति की क्रिया औ विशेषण हूँ मैं। भारत की चेतना का व्याकरण हूँ मैं। वेद पुराण उपनिषद को आत्मसात कराती हूँ, मैं। माँ सी वाणी विद्या की कलम हूँ मैं। साँसों सा संस्कार हूँ मैं, विचार का षोडशी श्रृंगार हूँ मैं। मेरी कई बहिनें हैं, कुछ चचेरी तो कुछ ममेरी ऑ फुफेरी हैं। सभी बहनों से हिलमिल कर समूचे देश में विचरती हूँ,मैं। मेरे सभी हैं सभी की हूँ मैं। दूर -सदूर प्रदेशों-देशों में, सिनेमा गीत और संगीत से पहचानी जाती हूँ, मैं। कभी शैलेंद्र के कभी साहिर के गीतों में गूँजती कभी सुब्रमणियम भारत की कविता हूँ मैं। कितनेकितने देशों को अपने सबल सुगंधित समता ममता के आँचल में  समेटती-सहेजती हूँ मैं। आज के युवा भारत की प्राणवायु हूँ मैं!!! सबके साथ सबका विश्वास सब का विकास!!! हाँ !हाँ! वसुधैव कुटुम्बकम की सहचरी हूँ मैं। हिंदी हूँ मैं ! हिंदी हूँ मैं। सूर्यकांत शर्मा,द्वारका नई दिल्ली।

व्यंग्य

फ़िल्म समीक्षा

ठिठकी हुई ‘सतलुज’-फ़िल्म समीक्षा

 सुशील उपाध्याय फिल्म 'सतलुज' (पुराना नाम 'पंजाब 95')। जो लोग इसे नहीं देखना चाहते थे, अब वे भी इसे देखने का जुगाड़ लगा रहे...

कहानी

पंकज सुबीर की कहानी-उस नाटे आदमी का नाम क्या था?

मैं अपने चैम्बर में होता हूँ तो कम्प्यूटर की स्क्रीन पर ही नज़रें जमाए होता हूँ। आजकल मेरा सारा काम कम्प्यूटर पर ही होता...

दीपक शर्मा की कहानी- दूध बताशा राजा खाए

समर वेकेशन के बाद हमारा कालेज जब खुला तो हमारे मनोविज्ञान विभाग में एक बड़ा सरप्राइज़ हमारी प्रतीक्षा में था। 38- वर्षीया हमारी विभागाध्यक्षा का...

अश्विनी कुमार सावन की पंजाबी कहानी- सपनों का पोस्टमार्टम

हिन्दी अनुवाद : डा. अमरजीत कौंके   ‘नामा’ बाज़ीगर अपने बड़े बेटे लाली को बांह से पकड़े थप्पड़ मारता हुआ घर की ओर लिए जा...

टोरौन्टो टैक्सी ड्राइवर की डायरी का पन्ना-विजय विक्रान्त

यूँ तो मेरा टैक्सी चलाने का समय दुपहर 12 बजे से शुरु होकर सुबह के चार बजे तक होता है, लेकिन उस दिन शहर...

ज्योत्स्ना कपिल की कहानी-कितने सलीब

दर्पण में स्वयं का रूप देखकर धानी फूली न समाई। आज वह खुद को अपनी नहीं बल्कि सुमेर की नज़रों से देख रही थी।...

लघुकथा

जमनिया नाम तो उसका जमना है पर बिगड़ते-बिगड़ते जमनिया हो गया है जो कि गाली-सा प्रतीत होता है । वह सोचती जा रही है, आज...

लेख

हलचल

पुस्तक