व्यथित उदास नदी
अपना अतीत याद करती है
पहाड़ों की प्यारी गोद से
जन्म लेकर
कैसे लहराती, इतराती
इठलाती ,कल कल करती
कांच सा पारदर्शी जल लिए
सफर पर निकली थी...
इकत्तीसवीं पाती
कड़वे घूँटों का सच
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सरबत चाची रमकल्लो को ढाढ़स बँधा रही थी। हार का अफसोस चाची को भी था लेकिन रमकल्लो की हालत देखकर...